काम आया संघर्ष, बेटे की मौत के चार साल बाद मां को मिलेगा दो लाख रुपये का इंश्योरेंस क्लेम
मौत के बाद पोस्टमार्टम न कराने पर बीमा कंपनी ने क्लेम देने से इनकार कर दिया। चार साल महिला न्याय के लिए भटकती रही, लेकिन कंपनी पर फर्क नहीं पड़ा। अब जिला उपभोक्ता फोरम ने बीमा कंपनी को बेटे की मृत्यु का बीमा क्लेम और मानसिक क्षतिपूर्ति देने के आदेश दिए हैं। नीरू अग्रवाल निवासी इंदर बाबा मार्ग किशनपुर ने जिला उपभोक्ता फोरम में शिकायत की थी। नीरू अग्रवाल के मुताबिक उन्होंने वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री बीमा सुरक्षा योजना के तहत 12 रुपये में पॉलिसी ली थी। इस बीच 25 दिसंबर 2015 को उनका बेटा यतार्थ अपनी कार से आईटी पार्क से राजपुर रोड की ओर जा रहा था। रास्ते में उसकी कार एक दीवार से टकरा गई। इससे उसे गंभीर चोट आईं और उसे मैक्स अस्पताल में भर्ती किया गया, लेकिन वहां उसने दम तोड़ दिया।


दुर्घटना में कोई आपराधिक मामला नहीं बना तो नीरू ने जिलाधिकारी से कह पोस्टमार्टम न कराने की अनुमति ले ली। ऐसे में पंचनामा के बाद पुलिस ने शव उनके सुपुर्द कर दिया। इसके बाद उन्होंने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी से पर्सनल एक्सीडेंट क्लेम मांगा तो कंपनी ने यह कहकर मना कर दिया कि यतार्थ का पोस्टमार्टम नहीं कराया गया। यही जवाब कंपनी ने उपभोक्ता फोरम के नोटिस पर भी दिया, लेकिन फोरम ने कंपनी के इस आधार को सिरे से खारिज कर दिया और कहा कि यह पर्सनल एक्सीडेंट क्लेम है तो इसमें पोस्टमार्टम की शर्त नहीं लगाई जा सकती है। ऐसे में नीरू अग्रवाल क्लेम के रूप में दो लाख रुपये पाने की हकदार हैं। इसके साथ ही 10 हजार रुपये मानसिक क्षतिपूर्ति और पांच हजार रुपये वाद खर्च भी कंपनी को नीरू अग्रवाल को देना होगा। 


बैंक को देना होगा गाड़ी के टैक्स का पैसा  



सुपुर्दगी में ली हुई गाड़ी बेचकर आरटीओ का टैक्स न चुकाने वाले बैंक को अब यह राशि अदा करनी होगी। जिला उपभोक्ता फोरम ने आदेश दिया है कि बैंक वाहन स्वामी को मानसिक क्षतिपूर्ति और वाद खर्च भी अदा करेगा। जिला उपभोक्ता फोरम ने सुंदरलाल बेलवाल निवासी अधोईवाला की शिकायत पर फैसला सुनाया है। सुंदरलाल ने एक टाटा स्पेसियो वाहन के लिए आईसीआईसीआई बैंक से 1.05 लाख रुपये लोन लिया था। कुछ दिन बाद ही उसकी तबीयत खराब रहने लगी तो उन्होंने यह वाहन 27 दिसंबर 2007 को बैंक के सुपुर्द कर दिया। सात साल बाद 23 अप्रैल 2014 को आरटीओ से सुंदरलाल बेलवाल को 2.12 लाख रुपये के टैक्स का नोटिस मिला। 


इस पर बेलवाल ने आरटीओ को बताया कि वह वाहन बैंक को दे चुका है, लेकिन आरटीओ में उसकी बात नहीं सुनी गई। इसके बाद आईसीआईसीआई बैंक से संपर्क किया। वहां पता चला कि बैंक ने वर्ष 2008 में ही वह वाहन 81 हजार रुपये में बेचकर अपने धन की भरपाई कर ली है। उसने बैंक से टैक्स चुकाने को कहा तो बैंक ने इनकार कर दिया। परेशान होकर बेलवाल ने फोरम में शिकायत की। बैंक ने फोरम से भी कहा कि वह टैक्स चुकाने के लिए जिम्मेदार नहीं है। फोरम ने उत्तरांचल मोटर व्हीकल टैक्सेसन एक्ट-2003 का हवाला दिया। फोरम ने कहा कि इस एक्ट के अनुसार यदि कोई व्यक्ति इस तरह बैंक को वाहन सुपुर्द कर देता है तो उसका टैक्स बैंक को ही अदा करना होता है। या जिसे वह वाहन बेचा जाता है तो दूसरा स्वामी उसका टैक्स देने का हकदार है। इस तरह फोरम ने बैंक को 2.12 लाख रुपये आरटीओ को अदा करने के आदेश दिया है। इसके साथ ही 10 हजार रुपये मानसिक क्षतिपूर्ति और पांच हजार रुपये वाद खर्च भी बैंक को ही देने होंगे।